
Talking Mirror
किरण जी, आपने जो नब्ज़ पकड़ी है वो सटीक है, आर्थिक स्वतंत्रता मिल भी जाए तो घर के भीतर वही पुराना हिसाब चलता रहता है, दोहरी ज़िम्मेदारी और ऊपर से ताना कि चुनाव तो तुमने ही किया था। यही वो जगह है जहाँ नौकरी का पैसा तो हाथ में आ जाता है, पर निर्णय लेने की, अपनी शर्तों पर जीने की स्वतंत्रता अब भी दूसरों की मंज़ूरी पर टिकी रह जाती है। सवाल यही खड़ा होता है, तनख्वाह मिलना और अपनी चेतना का मालिक होना, ये दोनों एक ही चीज़ नहीं हैं तो असली आज़ादी किसमें…















