
Talking Mirror
लवली जी, जिस व्यक्ति को आपने जीवन का केंद्रीय स्थान दिया, उसे परखने की कसौटी भी वही थी जो समाज देता है, अच्छे कर्म यानी अच्छा इंसान। अब जो नई दृष्टि मिली है, उसमें कर्ता को देखना सीख रही हैं, यह ठीक है। पर ज़रा देखिएगा, कहीं यह नई कसौटी भी किसी को परखने और फिर उसे जगह देने या न देने का एक और तरीका भर तो नहीं बन रही। रण का सफेद मैदान एक दिन में नहीं बनता, पानी को बार बार आना पड़ता है, सूखना पड़ता है, तब कहीं तह जमती है। किसी के केंद्र को जानना भी…















