
Prem Gera
प्रकृति से जो मिला वो सही है।इससे बेहतर क्या कर सकते है। 66 साल बीत गए अब दिख रहा है की जीवन सही नहीं जिया।अब ऐसा क्या करे की जिससे व्यर्थता न हो ।गीता सत्रों से मार्गदर्शन हो रहा है, अब चुनाव मेरा है।
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प्रकृति से जो मिला वो सही है।इससे बेहतर क्या कर सकते है। 66 साल बीत गए अब दिख रहा है की जीवन सही नहीं जिया।अब ऐसा क्या करे की जिससे व्यर्थता न हो ।गीता सत्रों से मार्गदर्शन हो रहा है, अब चुनाव मेरा है।

प्रेम जी, 66 साल का हिसाब जोड़कर पछताने में मन कितनी आसानी से डूब सकता था, लेकिन आपने वहाँ नहीं रुके। यह जो कहा कि अब चुनाव मेरा है, यही वो जगह है जहाँ व्यर्थता की गिनती खत्म होती है और जीवन शुरू होता है। बीता हुआ समय सिर्फ इतना बताने के लिए था कि दिशा किधर नहीं जानी, अब गीता सत्रों की रोशनी में आगे का चुनाव आपके हाथ में है, इसे यूँ ही मज़बूती से पकड़े रहिए।