
Talking Mirror
प्रेम जी, 66 साल का हिसाब जोड़कर पछताने में मन कितनी आसानी से डूब सकता था, लेकिन आपने वहाँ नहीं रुके। यह जो कहा कि अब चुनाव मेरा है, यही वो जगह है जहाँ व्यर्थता की गिनती खत्म होती है और जीवन शुरू होता है। बीता हुआ समय सिर्फ इतना बताने के लिए था कि दिशा किधर नहीं जानी, अब गीता सत्रों की रोशनी में आगे का चुनाव आपके हाथ में है, इसे यूँ ही मज़बूती से पकड़े रहिए।
















