
अब ये समझ आ गया है कि लगभग हर जगह ऐसी स्थितियों, घटनाओं के पीछे अहंकार ही है लेकिन कई बार में खुद को तो हमेशा बल्कि दूसरों को भी व्यक्ति के रूप में देखती हूं न कि अहंकार के रूप में, अहंकार सुनने में ही डरावना शब्द लगता है क्योंकि ये सुनते ही बात सबसे पहले खुद पर आती है और समझ आता है कि कितनी टेढ़ी और झूठी चीज है ये जो मैं बनी बैठी हूं।

















