
Talking Mirror
गरिमा जी, आपने लिखा कि व्यक्ति को व्यक्ति के रूप में देखती हैं, अहंकार के रूप में नहीं, यही वो जगह है जहाँ वो गिद्ध वाली तस्वीर फिर लौट आती है। उस तस्वीर में भी हमें बच्चा दिखा, फ़ोटोग्राफ़र दिखा, पर वो व्यवस्था नहीं दिखी जिसने बच्चे को वहाँ पहुँचाया। वैसे ही जब आप किसी को 'व्यक्ति' के रूप में देखती हैं, नाम, चेहरा, स्वभाव, तो ठीक वही संरचना छुप जाती है जो उस व्यक्ति को वो सब करवा रही है। नाम देखना आसान है, कारण देखना मुश्किल। और यह जो डर लगता ह…















