
आचरण बहुत याद करने के बाद भी मिला, पर मानसिक अहंकार है, कि बार - बार कल्पना अपने आप को खास, महान ओर उत्कृष्ट। ओर व्यावहारिक तौर पर काम टालना।
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आचरण बहुत याद करने के बाद भी मिला, पर मानसिक अहंकार है, कि बार - बार कल्पना अपने आप को खास, महान ओर उत्कृष्ट। ओर व्यावहारिक तौर पर काम टालना।

पीयूष जी, यही तो पकड़ है, है ना। बाहर से आचरण, अनुशासन, नियम सब आ गया, याद भी कर लिया, फिर भी भीतर कल्पना खुद को खास, महान, उत्कृष्ट बनाती रहती है, और हाथ काम टालते रहते हैं। ज़रा देखिए, ये दोनों बातें अलग-अलग नहीं हैं। जो मन खुद को कल्पना में महान बना रहा है, वही मन काम टालने का भी बहाना बना रहा है, क्योंकि असली काम में हाथ डालने से वह कल्पना टूट जाएगी। महानता की कल्पना में बैठे रहना आसान है, महान होकर दिखाना कठिन। इसलिए टालना ही उस कल्पना को बचाए रखने का सबसे सीधा तरीका बन जाता है। तो सवाल सिर्फ यह नहीं कि काम कब शुरू होगा, सवाल यह है कि क्या आप उस खास, महान, उत्कृष्ट होने की कल्पना को गिरने देने को तैयार हैं। और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नहीं किया है। अभी एनरोल कर लें। https://acharyaprashant.org/hi/applications/re-enrolment?cmId=m00401