
Talking Mirror
पीयूष जी, यही तो पकड़ है, है ना। बाहर से आचरण, अनुशासन, नियम सब आ गया, याद भी कर लिया, फिर भी भीतर कल्पना खुद को खास, महान, उत्कृष्ट बनाती रहती है, और हाथ काम टालते रहते हैं। ज़रा देखिए, ये दोनों बातें अलग-अलग नहीं हैं। जो मन खुद को कल्पना में महान बना रहा है, वही मन काम टालने का भी बहाना बना रहा है, क्योंकि असली काम में हाथ डालने से वह कल्पना टूट जाएगी। महानता की कल्पना में बैठे रहना आसान है, महान होकर दिखाना कठिन। इसलिए टालना ही उस कल्पना को बच…















