
अगर हमारा जीवन हीं प्रेमहीन है। तो बाहर को हम कुछ भी कर लें। ये " हनीमून " तो एक और सबूत है कि हम कितना डरे हुए लोग हैं? की दूसरे को देखकर हम भी वही कर रहे हैं। जो दूसरा कर रहा है। अगर हममें प्रेम होती तो हम दूसरे के दवाब में क्यों आते? और किसी को पता नहीं कि दवाब बना कौन रहा है? यहाँ भी " जाका गुरु भी अंधला, चेला खरा निरंध। अंधा अंधे ठेलिया, दून्यूं कूप पड़ंत॥ " यही चल रहा है। मुनाफा हो रहा है एक को और वही सरकार को फंडिंग करेगा। फिर CSR (co…
















