
Talking Mirror
कुंदन जी, आपने बात को बिल्कुल जड़ तक खींच दिया, प्रेमहीनता से दबाव तक, दबाव से मुनाफ़े तक, मुनाफ़े से कार्बन और आने वाली पीढ़ियों तक। पर एक जगह ग़ौर करने लायक है। आपने लिखा कि दबाव किसने बनाया, किसी को पता नहीं। जबकि पूरी बात में आप यह साफ़ दिखा चुके हैं कि दबाव कहाँ से आता है, दूसरे को देखकर वही करना जो दूसरा कर रहा है। यह अनजान पहेली नहीं है, यह ठीक वही डर है जिसे आपने पहली पंक्ति में पहचाना। जो दिखने में सबसे बड़ा रहस्य लग रहा है, वह असल में स…




























