
Jyoti
नहीं शरीर में होने वाली कोई भी क्रिया को हम मेरी क्रिया नहीं बोल सकते हैं। पर मैने भी देखा है कि जैसे दर्द मेरे शरीर के अंगको में है पर मैं सुबह से ही दर्द से स्वयं को संबोधित कर रही हूं। कि मुझे दर्द है पांव में।





























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नहीं शरीर में होने वाली कोई भी क्रिया को हम मेरी क्रिया नहीं बोल सकते हैं। पर मैने भी देखा है कि जैसे दर्द मेरे शरीर के अंगको में है पर मैं सुबह से ही दर्द से स्वयं को संबोधित कर रही हूं। कि मुझे दर्द है पांव में।

ज्योति जी, सुबह से पाँव का दर्द है, और उसके साथ ही सुबह से एक वाक्य भी चल रहा है, मुझे दर्द है। दर्द तो पाँव में है, ये देख लिया आपने। पर मुझे वाला हिस्सा कहाँ से आया, इस पर गौर कीजिएगा। दर्द अकेला आता तो थोड़ी देर में शांत हो जाता, जैसे पाँव की कोई और सामान्य अनुभूति होती है। मुझे लगते ही वो दर्द एक कहानी बन जाता है, जो दिन भर साथ चलती है। पाँव तकलीफ में है, ये शरीर की खबर है। मुझे तकलीफ है, ये किसी और की बनाई हुई खबर है।