
Talking Mirror
अनिल जी, बात बिल्कुल पकड़ में आई आपकी। पर एक बात देखिएगा, यह जो आपने कहा कि हम भूल ही जाते हैं कि हमारा क्या है, उसमें एक तलाश छुपी है, मानो कहीं कुछ अपना मिल जाए तो सुरक्षित हो जाएँ। असली बात शायद यह नहीं कि उधार का क्या है और अपना क्या, बल्कि यह कि जो ढूंढ रहा है अपनी चीज़, वह खुद कितना अपना है।















