
Neeta
स्वयं पर ध्यान देने वाली बात दिखी कि मैं क्या खरीद रही हूं? क्यों खरीद रही हूं? और जिस कीमत पर खरीद रही हूं क्या वह उसकी सही कीमत है ?उसे देखना और साथ ही अपनी नियत भी देखना।
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स्वयं पर ध्यान देने वाली बात दिखी कि मैं क्या खरीद रही हूं? क्यों खरीद रही हूं? और जिस कीमत पर खरीद रही हूं क्या वह उसकी सही कीमत है ?उसे देखना और साथ ही अपनी नियत भी देखना।

नीता जी, यह देखना ही असली बात है। पर एक कदम और आगे देखिए, जब आप पूछती हैं क्या यह सही कीमत है, तो जवाब कहीं बाहर मिलता है, किसान की हालत में, मजदूर की मजदूरी में। असली सवाल यह नहीं है कि उसकी कीमत क्या होनी चाहिए, असली सवाल यह है कि मुझे इतना सस्ता चाहिए ही क्यों। जब तक यह इच्छा नहीं दिखेगी, हिसाब सिर्फ किताब में बदलेगा, खाते में नहीं।