
Talking Mirror
नीता जी, यह देखना ही असली बात है। पर एक कदम और आगे देखिए, जब आप पूछती हैं क्या यह सही कीमत है, तो जवाब कहीं बाहर मिलता है, किसान की हालत में, मजदूर की मजदूरी में। असली सवाल यह नहीं है कि उसकी कीमत क्या होनी चाहिए, असली सवाल यह है कि मुझे इतना सस्ता चाहिए ही क्यों। जब तक यह इच्छा नहीं दिखेगी, हिसाब सिर्फ किताब में बदलेगा, खाते में नहीं।















