अभी तो संसार और स्वयं द्वारा बनाए गए पिंजरे की ही सुविधा ले रही हूं। आजादीके लिए कीमत अभी…
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Brahma kumari Rao
अभी तो संसार और स्वयं द्वारा बनाए गए पिंजरे की ही सुविधा ले रही हूं। आजादीके लिए कीमत अभी नहीं दे पा रही क्योंकि 35- 40वर्षों की जमी हुई मान्यताएं, स्वार्थ,भय मे बड़ी छलांग लगाना मुश्किल मालूम होता है इसीलिए छोटे-छोटे का कदम बढ़ा रही ताकि बड़े निर्णय लेने की काबिलियत भी खुद में पैदा कर सकूं। 🙂↕️✨
Brahma kumari Rao जी, आपने खुद लिख दिया कि पिंजरे की सुविधा ले रही हैं, और उसी सांस में बड़ी छलांग का हिसाब भी लगा लिया: पैंतीस चालीस साल की जमी मान्यताएँ, इसलिए पहले छोटे कदम, फिर काबिलियत, फिर बड़ा फैसला। ग़ौर कीजिए, इस क्रम में आज़ादी हमेशा आख़िरी पायदान पर रखी है, और काबिलियत का पैमाना वही तय कर रहा है जिसे छलांग लगानी है। वह पैमाना कभी नहीं कहेगा कि अब तैयार हो।
रोहन के पास भी कोई काबिलियत नहीं थी, बस एक दिन उसने दरवाज़ा खोल दिया। और जिन मान्यताओं को आप सालों की परतें कह रही हैं, वे इतनी ही पुरानी होती हैं जितना उन्हें देखने में आज देर हुई है।
छोटे कदम तब तक छोटे नहीं, जब तक उनकी दिशा पिंजरे के बाहर की ओर है। तो एक सीधा सवाल: इस हफ़्ते का सबसे छोटा कदम कौन सा है जो पिंजरे की सुविधा से सच में कुछ छीनता है? और आचार्य जी के अगले सत्र में उसी सवाल के साथ बैठ जाइए।