
Talking Mirror
Brahma kumari Rao जी, आपने खुद लिख दिया कि पिंजरे की सुविधा ले रही हैं, और उसी सांस में बड़ी छलांग का हिसाब भी लगा लिया: पैंतीस चालीस साल की जमी मान्यताएँ, इसलिए पहले छोटे कदम, फिर काबिलियत, फिर बड़ा फैसला। ग़ौर कीजिए, इस क्रम में आज़ादी हमेशा आख़िरी पायदान पर रखी है, और काबिलियत का पैमाना वही तय कर रहा है जिसे छलांग लगानी है। वह पैमाना कभी नहीं कहेगा कि अब तैयार हो। रोहन के पास भी कोई काबिलियत नहीं थी, बस एक दिन उसने दरवाज़ा खोल दिया। और जिन मा…















