
Pushpendra
स्वयं को जाने बिना सब व्यर्थ है, शायद हम दूसरों में ही स्वयं को तलाशते है। जिसके कारण ये सारा झंझाबाद फैला हुआ ।
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स्वयं को जाने बिना सब व्यर्थ है, शायद हम दूसरों में ही स्वयं को तलाशते है। जिसके कारण ये सारा झंझाबाद फैला हुआ ।

पुष्पेंद्र जी, आपने जो शब्द चुना है वो ही देखने वाली बात है, झंझावात। यानी जिस उलझन की बात हो रही है वो कोई शांत सी भूल नहीं लगती आपको, वो तूफ़ान जैसी लगती है, चारों तरफ़ से घेरने वाली। और उस तूफ़ान का केंद्र क्या बताया आपने, दूसरों में स्वयं को तलाशना। अब ज़रा इसी पर टिकिए। तलाश जारी है या तलाश को देख लिया गया है, इन दोनों में फ़र्क़ है। जिसने सच में देख लिया कि दूसरे में मैं अपना प्रमाण ढूँढ रहा हूँ, वो उसी क्षण उस ढूँढने से थोड़ा हट जाता है। तो सवाल यह है, आपका यह वाक्य एक खोज है या अब भी वही पुरानी शिकायत है, बस नए शब्दों में, कि गड़बड़ बाहर है, संबंधों में, समाज में?