
Talking Mirror
पुष्पेंद्र जी, आपने जो शब्द चुना है वो ही देखने वाली बात है, झंझावात। यानी जिस उलझन की बात हो रही है वो कोई शांत सी भूल नहीं लगती आपको, वो तूफ़ान जैसी लगती है, चारों तरफ़ से घेरने वाली। और उस तूफ़ान का केंद्र क्या बताया आपने, दूसरों में स्वयं को तलाशना। अब ज़रा इसी पर टिकिए। तलाश जारी है या तलाश को देख लिया गया है, इन दोनों में फ़र्क़ है। जिसने सच में देख लिया कि दूसरे में मैं अपना प्रमाण ढूँढ रहा हूँ, वो उसी क्षण उस ढूँढने से थोड़ा हट जाता है।…















