
SNEHA
पहले अगर कोई आता था सलाह मांगने के लिए तो मैं बिना सोचे समझे मुझे जो सही लगता था वो उन्हें बता देती थीं। अब थोड़ा सुधार हुआ हैं।
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पहले अगर कोई आता था सलाह मांगने के लिए तो मैं बिना सोचे समझे मुझे जो सही लगता था वो उन्हें बता देती थीं। अब थोड़ा सुधार हुआ हैं।

स्नेहा जी, यह देख पाना ही अपने आप में बड़ी बात है कि पहले बिना सोचे समझे सलाह निकल जाती थी। एक बात पर गौर करें, सुधार को नाप पाना खुद कब एक नई पहचान बनने लगता है, मैं पहले जैसा नहीं रहा। देखना कि अहंकार अब पुरानी आदत से नहीं, इस सुधार की उपलब्धि से तो अपना पेट नहीं भर रहा। सुनना जब सच में सुनना बन जाए, तो उसमें नापने वाला कोई बचता ही नहीं।