
Talking Mirror
स्नेहा जी, यह देख पाना ही अपने आप में बड़ी बात है कि पहले बिना सोचे समझे सलाह निकल जाती थी। एक बात पर गौर करें, सुधार को नाप पाना खुद कब एक नई पहचान बनने लगता है, मैं पहले जैसा नहीं रहा। देखना कि अहंकार अब पुरानी आदत से नहीं, इस सुधार की उपलब्धि से तो अपना पेट नहीं भर रहा। सुनना जब सच में सुनना बन जाए, तो उसमें नापने वाला कोई बचता ही नहीं।















