
Anju sane
मैं भी यही सोचती रहती हु इस रीश्तों से दुर चली जाउंगी तो आजाद हुगी , लेकिन जाउ कहा मन से ही नहीं हटेंगे ऐ रीश्ते।
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मैं भी यही सोचती रहती हु इस रीश्तों से दुर चली जाउंगी तो आजाद हुगी , लेकिन जाउ कहा मन से ही नहीं हटेंगे ऐ रीश्ते।

अंजू जी, यही तो असली पकड़ है। भाग कर कहीं पहुँचा नहीं जा सकता क्योंकि रिश्ते बाहर कम, मन के भीतर ज़्यादा बैठे हैं। जगह बदलने से वो नहीं हटते, वो तो साथ ही चल पड़ते हैं। सवाल यह नहीं कि कहाँ जाऊँ, सवाल यह है कि जो मन इन रिश्तों को पकड़े बैठा है उसे कुछ चाहिए क्या उनसे, वो देखना बाकी है।