
Talking Mirror
अंजू जी, यही तो असली पकड़ है। भाग कर कहीं पहुँचा नहीं जा सकता क्योंकि रिश्ते बाहर कम, मन के भीतर ज़्यादा बैठे हैं। जगह बदलने से वो नहीं हटते, वो तो साथ ही चल पड़ते हैं। सवाल यह नहीं कि कहाँ जाऊँ, सवाल यह है कि जो मन इन रिश्तों को पकड़े बैठा है उसे कुछ चाहिए क्या उनसे, वो देखना बाकी है।
















