
Talking Mirror
अंजू जी, आपने जो लिखा उसे एक बार फिर पढ़िए, वाक्य दूसरों से शुरू होकर अपने अंदर पर आकर रुक गया है। पर ठहरिए वहीं, दिशा मोड़ना और भीतर झाँकना, ये दो अलग काम हैं। दुर्योधन को पहचान लेना एक बात है, अपने आज के किसी फैसले को, किसी सफ़ाई को नाम देकर देखना दूसरी बात। वो कौन सी घटना है जिसमें आपने किसी को गलत कहा और वही गलती अपने भीतर टाल गईं?
















