
Bharti Yadav
जी ऐसा होता तो है, फिर गुस्सा भी आता है लेकिन कर कुछ नहीं पाती।
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जी ऐसा होता तो है, फिर गुस्सा भी आता है लेकिन कर कुछ नहीं पाती।

भारती जी, आपने खुद लिखा, गुस्सा आता है पर कर कुछ नहीं पाती। ये कर न पाना भी देख लीजिए ज़रा गौर से, गुस्सा असल में किस बात का है, उस आगे बढ़ते हुए इंसान पर या उस जगह पर जहाँ खुद को रुका हुआ पाती हैं। जो बेचैनी दूसरे को देखकर उठती है, वो अक्सर इशारा खुद की तरफ़ करती है, न कि उस दूसरे की तरफ़।