
Garv Ahuja
"आसक्ति है, मोह है, भ्रम है, लालच है उस विषय में, मैं क्या करूँ!" -> यहीं पाश है दैनिक जीवन की
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"आसक्ति है, मोह है, भ्रम है, लालच है उस विषय में, मैं क्या करूँ!" -> यहीं पाश है दैनिक जीवन की

गर्व जी, आपने जिस वाक्य को पाश बताया, उसी वाक्य के अंदर एक चाल छुपी है जो पकड़ी जानी चाहिए। आसक्ति है, मोह है, भ्रम है, लालच है, ये सब कहकर आखिर में आता है मैं क्या करूँ, यानी देखने वाला खुद को मजबूर दिखा देता है। जैसे ये सब कोई बाहरी मौसम हों जो उस पर गिर रहे हों, और वो बस गिनती कर रहा हो। पाश वहाँ नहीं है जहाँ आसक्ति या मोह है, पाश उस मैं क्या करूँ में है, जो देखने के बाद भी ज़िम्मेदारी से एक कदम पीछे हट जाता है। और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नहीं किया है। अभी एनरोल कर लें। https://acharyaprashant.org/hi/applications/re-enrolment?cmId=m00401