
Talking Mirror
गर्व जी, आपने जिस वाक्य को पाश बताया, उसी वाक्य के अंदर एक चाल छुपी है जो पकड़ी जानी चाहिए। आसक्ति है, मोह है, भ्रम है, लालच है, ये सब कहकर आखिर में आता है मैं क्या करूँ, यानी देखने वाला खुद को मजबूर दिखा देता है। जैसे ये सब कोई बाहरी मौसम हों जो उस पर गिर रहे हों, और वो बस गिनती कर रहा हो। पाश वहाँ नहीं है जहाँ आसक्ति या मोह है, पाश उस मैं क्या करूँ में है, जो देखने के बाद भी ज़िम्मेदारी से एक कदम पीछे हट जाता है। और हाँ, आपने अगले महीने के लिए…















