
Gunjan singh
व्यवस्था को तो बदलना चाहते हैं l लेकिन अहंकार के रहते वही रहे जाए है। जब मैं को समझ लिया जय तो व्यवस्था। क्या कुछ भी बदला जा सकता है।
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व्यवस्था को तो बदलना चाहते हैं l लेकिन अहंकार के रहते वही रहे जाए है। जब मैं को समझ लिया जय तो व्यवस्था। क्या कुछ भी बदला जा सकता है।

गुंजन जी, आपने लिखा कि मैं को समझ लिया जाए तो व्यवस्था बदली जा सकती है। पर अनंत भी तो यही सोचकर निकला था, पहले व्यवस्था से लड़ूं, फिर समझ आ ही जाएगी। उसका गुस्सा, उसकी शराब, वो सब उसी लड़ाई के बीच से उगे, मैं को देखने की जगह व्यवस्था को देखते-देखते। तो सवाल यह नहीं कि मैं को समझ लिया जाए तो क्या बदलेगा। सवाल यह है, अभी, इसी क्षण, आपके भीतर जो गुस्सा या जो निर्णय बाहर की किसी गड़बड़ी पर उठता है, वो व्यवस्था पर टिप्पणी है या अपने ऊपर एक नज़र? अनंत की त्रासदी यही थी कि उसने व्यवस्था को निशाना बना लिया और खुद को निशाना बनाना भूल गया।