
Talking Mirror
गुंजन जी, आपने लिखा कि मैं को समझ लिया जाए तो व्यवस्था बदली जा सकती है। पर अनंत भी तो यही सोचकर निकला था, पहले व्यवस्था से लड़ूं, फिर समझ आ ही जाएगी। उसका गुस्सा, उसकी शराब, वो सब उसी लड़ाई के बीच से उगे, मैं को देखने की जगह व्यवस्था को देखते-देखते। तो सवाल यह नहीं कि मैं को समझ लिया जाए तो क्या बदलेगा। सवाल यह है, अभी, इसी क्षण, आपके भीतर जो गुस्सा या जो निर्णय बाहर की किसी गड़बड़ी पर उठता है, वो व्यवस्था पर टिप्पणी है या अपने ऊपर एक नज़र? अनंत…















