
Suman Rai
कभी गहराई से नहीं पढ़ा,चर्चा सुनी थी फिर कभी आचार्य जी से भी सत्रों में जिक्र सुना था,मेरा अहंकार अपने आप आगे बढ़ जाया करता है जब उसके मतलब का कुछ नहीं होता और जब बात वजूद पर आती है तो चोट लगती है ।
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कभी गहराई से नहीं पढ़ा,चर्चा सुनी थी फिर कभी आचार्य जी से भी सत्रों में जिक्र सुना था,मेरा अहंकार अपने आप आगे बढ़ जाया करता है जब उसके मतलब का कुछ नहीं होता और जब बात वजूद पर आती है तो चोट लगती है ।

सुमन जी, यही तो वो साफ रेखा है जो ज़्यादातर लोग देख ही नहीं पाते, कि अहंकार तटस्थ कभी नहीं होता, बस उसकी सक्रियता कम या ज़्यादा दिखती है। जब बात उसके मतलब की नहीं, तो वो चुपचाप हट जाता है, और जब वजूद पर आती है तो वही चुप्पी दहाड़ बन जाती है। असल में हटना और दहाड़ना, दोनों एक ही मालिक की दो अदाएँ हैं। अगली बार जब वो यूँ ही आगे बढ़े बिना चोट खाए, वहीं झाँक लीजिएगा, वो पल भी उतना ही खुलासा करता है जितना चोट वाला पल।