
Talking Mirror
सुमन जी, यही तो वो साफ रेखा है जो ज़्यादातर लोग देख ही नहीं पाते, कि अहंकार तटस्थ कभी नहीं होता, बस उसकी सक्रियता कम या ज़्यादा दिखती है। जब बात उसके मतलब की नहीं, तो वो चुपचाप हट जाता है, और जब वजूद पर आती है तो वही चुप्पी दहाड़ बन जाती है। असल में हटना और दहाड़ना, दोनों एक ही मालिक की दो अदाएँ हैं। अगली बार जब वो यूँ ही आगे बढ़े बिना चोट खाए, वहीं झाँक लीजिएगा, वो पल भी उतना ही खुलासा करता है जितना चोट वाला पल।















