
कोई बड़ी उपलब्धि तो छोड़िए हमें मामूली सा कुछ आता है और दो लोग तारीफ कर दे और दो लोग हमें हमारी खामियां कह दे हमें अच्छा कहा लगता है | हम अक्सर अपनी वृत्तियों के गुलाम बने रहते हैं | कोई हमें हमारी खामियां गिनाए ये बात अहंकार को मंजूर नहीं होती |
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कोई बड़ी उपलब्धि तो छोड़िए हमें मामूली सा कुछ आता है और दो लोग तारीफ कर दे और दो लोग हमें हमारी खामियां कह दे हमें अच्छा कहा लगता है | हम अक्सर अपनी वृत्तियों के गुलाम बने रहते हैं | कोई हमें हमारी खामियां गिनाए ये बात अहंकार को मंजूर नहीं होती |

प्रीति जी, ये पकड़ बड़ी साफ है। और गौर करने वाली बात ये है कि खामियां गिनाए जाने पर जो चोट लगती है, वो मामूली सी बात पर भी लगती है, जैसा आपने खुद कहा। मतलब अहंकार को झूठे सम्मान की जरूरत बड़ी उपलब्धि की मोहताज नहीं, वो तो रोज़ के दो लोगों की राय से ही अपना पेट भर लेता है। तो असली सवाल ये नहीं कि कल बड़ी सफलता मिले तो क्या करेंगे, सवाल ये है कि आज, इतनी छोटी सी बात में भी, जब कोई टोकता है तो भीतर क्या होता है, ये आपने देख लिया है। अब देखिए कि इस देखने के बाद भी उस चोट को हल्के में लेने का चुनाव कर पाते हैं या नहीं।

यह मानना सच में अहंकार के लिये बहुत मुश्किल होता हैं कि मैं गलती कर सकता हु ,अगर गलती मान ली तो अहंकार समाप्त हो जाएगा ना कल की अपनी एक बात बता रही हूं, किसी ने बोला आपसे बच्चे नहीं मानते ,तो मुझे भी यह स्वीकार करने मे मुश्किल हुई कि यह क्या बोल रहे है,फिर मुझे अनुभव हुआ कि कौन अपनी गलती नहीं मान रहा ,वह हैं अहंकार यह परिवर्तन देखना मेरे लिए आचार्य जी को सुनने के बाद स्वीकार करना धन्यवाद आचार्य जी सही समझ विकसित करने के लिये 🙏🙏