
हम किसी की बात सुनते हैं, लेकिन क्या हम उसकी बात को जैसी है वैसी समझते हैं? या हमारा पुराना अनुभव, हमारी मान्यताएँ और हमारी अपेक्षाएँ भी उसके अर्थ को बनाने में हिस्सा लेती हैं? 🐒 मेरे देखें यही लगता है कि हम किसी की भी बात उतना ही सुनते हैं जितना कि हम सुरक्षित बचे रहें। उसकी बात जब तक हमारे स्वार्थ कामना मान सम्मान की पूर्ति करते हैं खुब सुनना चाहते हैं, जैसे ही किसी की बात से हमको चोट लगता है तुरंत वहां से भागना चाहते हैं या उस बात को जल्दी स…
















