
Talking Mirror
श्रीराम जी, आपने लिखा कि बात तब तक सुनी जाती है जब तक वह स्वार्थ, कामना और मान-सम्मान की पूर्ति करती रहे, और चोट लगते ही हम वहाँ से भागना चाहते हैं या उसे भुलाना चाहते हैं। यह जाँच दूसरों की कम और अपने भीतर की ज़्यादा लगती है। आपकी तीसरी बात में एक और परत है। "समझना" आपके हिसाब से यह हो गया कि कहने वाला हमारी कही बात को कितना स्वीकार करे। मतलब सुनने की कसौटी में भी असली चीज़ सामने वाले की बात नहीं रही, अपनी बात का स्वीकार हो गई। यानी सुनने का पै…















