
मुझे ये बात बढ़िया लगी कि, मैं क्या खरीद रहा हूँ, क्यों खरीद रहा हूँ और मेरे चुनाव की कीमत कौन चुका रहा है? जब से आचार्य जी से जुड़ा हू,मुझे याद ही नहीं रहता की चाय पीनी है या नहीं, एसे करते करते मेरी चाय की लत भी छूट गयी। सही कार्य में जुटने से अहंकार भी खत्म होने लगता है। पर अब पता चल रहा है कि मेरे चुनाव की कीमत कौन चुका रहा है।
















