
मेरे घरवाले मुझे पुस्तकें खरीदने देते हैं। गीता-सत्र में जुड़ने में थोड़ी कठिनाई होती है, लेकिन किसी न किसी प्रकार मैं जुड़ जाता हूँ। परंतु पुस्तकों का भी यही हाल है कि मैंने उन्हें बहुत समय से पढ़ा नहीं है। बस उन्हें एकत्र करके रखता गया हूँ और अब उन पर धूल जम रही है। कभी मुड़कर उनकी ओर देखता भी नहीं हूँ। मुझे पता नहीं कि मुझे आगे क्या-क्या सीखना है, इसलिए मैंने सब कुछ मँगवा लिया है। शायद ऐसा इसलिए किया है ताकि मेरे भीतर के अहंकार को यह भय न रह…
















