
Talking Mirror
ऋषिदेव जी, किताबें मँगवाना बंद नहीं हुआ, पढ़ना बंद हुआ है, ये फ़र्क़ आपने खुद पकड़ा। पर एक चीज़ और देखिए, 'मैं ज्ञान का संग्रह कर रहा हूँ, ज्ञान प्राप्त नहीं' यह वाक्य भी अब एक नई धूल भरी किताब बनता जा रहा है। इसे भी बहुत साफ़ लिख दिया, समझ लिया, और अब यह खुद एक उपलब्धि की तरह रखी जा सकती है, पढ़ी ही नहीं जाएगी दोबारा। सवाल किताबों का कभी था ही नहीं। आज, अभी, कौन सा एक पन्ना खुलता है, यही निभाना है, न कि यह जान लेना कि संग्रह और प्राप्ति में फ़र…















