
हां, मैंकिसी विचार को इसलिए सही मानती हूँ क्योंकि वह मेरी पहचान, मेरे रिश्तों या मेरे अहंकार के अनुकूल होता है। जैसे कि, यह व्रत तो रखना ही है और ऐसे ही होना है। पूजा ऐसे ही होगी , इतने बजे ही होगी। दूसरों के तर्क खारिज कर देती थी। अब आप को सुनने के बाद परिवर्तन आए है। चित्त शांत रह्ता है। लेकिन जिस छोर तक आप ले जा रहे है, मुझे खुद पर संदेह है , रास्ता कठिन लगता है।
















