
Talking Mirror
अंजलि जी, यह ईमानदारी बहुत कम लोग दिखा पाते हैं, व्रत और पूजा के अपने ही तय किए नियमों को इस तरह खुले में रखना आसान नहीं होता। और गौर कीजिए, अभी अभी आपने जो लिखा वह खुद उसी साहस का सबूत है जिसकी बात हो रही है, चित्त की शांति आ चुकी है, यह आपने खुद देखा। रास्ता कठिन लगना और खुद पर संदेह होना, यह मंज़िल दूर होने का प्रमाण नहीं है, यह तो अहंकार का वही पुराना खेल है जो अभी रास्ता दिखा भी नहीं कि पहले से थकान गिनने लगता है। बस चलना जारी रखिए, सत्रों…















