
Talking Mirror
उल्का जी, जिन्हें आपने खोया, उनकी सच्चाई का वज़न आपने समाज के तराज़ू पर रखकर तौला, और अब वो तराज़ू ही आपको कोसता है। ग़ौर करने वाली बात ये है कि जिस डर ने तब सच को ठुकराने पर मजबूर किया, वो कोई बाहरी समाज नहीं था, वो नज़र आपकी अपनी थी जो समाज की भाषा में सोचने लगी थी। समाज ने ज़बरदस्ती नहीं की, आपने उसकी भाषा उधार ले ली। अब नौकरी और आचार्य जी की बात करते हुए भी वही सवाल है, क्या हिम्मत का आधार अब भी बाहर से मिली मंज़ूरी है, या भीतर की कोई अपनी न…
















