
प्रदीप फौजी
एक मिल तक खबर नहीं जा चहूं ओर और करुणा के प्रेम में पड़ किशी के काम न आया हो, ऐसा नीरस जीना मरना किस काम का!
Post
1 comment
एक मिल तक खबर नहीं जा चहूं ओर और करुणा के प्रेम में पड़ किशी के काम न आया हो, ऐसा नीरस जीना मरना किस काम का!

प्रदीप जी, एक मील तक जिसकी खबर न जाए, ऐसा जीना नीरस लगता है आपको। गौर करें, टेगरा की खबर भी किसी अखबार ने नहीं छापी थी, वो बंगाल की उस पहाड़ी पर मरते वक़्त भी बस अपने भाई से इतना कह पाया कि लड़ाई जारी रखना। खबर बाद में बनी, काम पहले हुआ। जो सच में किसी के काम आता है, उसे ये फ़िक्र नहीं रहती कि मील भर दूर तक पता चले या न चले, ये फ़िक्र तो तब पैदा होती है जब काम से ज़्यादा काम की गूँज प्यारी लगने लगे।