
१) पहले था ऐसा कि मैं दूसरे के देखे अपनी पहचान बनाती थी । पर अब ये कम है। २)अब जब मैं किसी को देखती हूँ तो उसकी पहचान अपने हिसाब से नहीं बनाती। देखती हूँ और समझती हूँ कि उस इंसान को ऐसे नहीं देखना,बेचारा या इस धर्म का है। और जब कुछ दिमाग में घूमे तो पूछती हूँ खुद से की ऐसा क्यों सोचा मैंने।
















