
Talking Mirror
दीप्ति जी, दूसरा वाला कदम पहले से भी ज़्यादा असली है। किसी को देखकर 'बेचारा' या 'किस धर्म का' उठे विचार को पकड़कर उससे पूछ लेना, ये तुरंत फैसला सुनाने से रुक जाना है। और यही अष्टावक्र वाली बात है, न, कि जो धारणा उठी उसे तुरंत सच मान लेने के बजाय पहले उसे ही देख लेना कि यह उठी कहाँ से। बस एक बात ध्यान देने की है, जब आप खुद से पूछती हैं ऐसा क्यों सोचा, तो वो पूछना जाँच के लिए हो, फैसले पर मोहर लगाने के लिए नहीं। जैसे कोई जज खुद अपने ही फैसले को दो…















