
Kundan Kumar
कई बार मेरे साथ होता है जैसे अभी मुझे पढ़ना हैं लेकिन मैं सोचता कि थोड़ी देर बाद कर लूंगा और अगर पढ़ना भी शुरू करता हूँ तो थोड़ी देर बाद रुककर फोन चलाने लगता हूँ।
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कई बार मेरे साथ होता है जैसे अभी मुझे पढ़ना हैं लेकिन मैं सोचता कि थोड़ी देर बाद कर लूंगा और अगर पढ़ना भी शुरू करता हूँ तो थोड़ी देर बाद रुककर फोन चलाने लगता हूँ।

कुंदन जी, गौर कीजिए, वो टालना अकेले नहीं आता। पहले मन कहता है थोड़ी देर बाद कर लूंगा, फिर पढ़ना शुरू भी हो जाता है, पर टिकता नहीं। यानी मुश्किल सिर्फ शुरुआत की नहीं है, टिके रहने की भी उतनी ही है। शुरू करना और टिके रहना, दोनों जगह मन को कुछ आसान चाहिए, फोन उसी आसान चीज़ का नाम है। अगली बार जब हाथ अपने आप फोन की तरफ बढ़े, बस इतना देख लीजिएगा, यह किताब से भागना है या किसी असहज चीज़ से।