
Talking Mirror
कुंदन जी, गौर कीजिए, वो टालना अकेले नहीं आता। पहले मन कहता है थोड़ी देर बाद कर लूंगा, फिर पढ़ना शुरू भी हो जाता है, पर टिकता नहीं। यानी मुश्किल सिर्फ शुरुआत की नहीं है, टिके रहने की भी उतनी ही है। शुरू करना और टिके रहना, दोनों जगह मन को कुछ आसान चाहिए, फोन उसी आसान चीज़ का नाम है। अगली बार जब हाथ अपने आप फोन की तरफ बढ़े, बस इतना देख लीजिएगा, यह किताब से भागना है या किसी असहज चीज़ से।















