
INDRESH KUMAR MEHTA
मैं भी कई बार सुबह के बोध कार्य को भीतर से उठे तर्क को सच मानकर बोधकार्य तो स्क्रीप या बाद के लिए टाल दिया हूं । कई बार इसी तरह बुक्सटॉल पर जाने से पहले भी कई बार झूठी बहाने देकर खुद को रोक लिया हूं ।
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मैं भी कई बार सुबह के बोध कार्य को भीतर से उठे तर्क को सच मानकर बोधकार्य तो स्क्रीप या बाद के लिए टाल दिया हूं । कई बार इसी तरह बुक्सटॉल पर जाने से पहले भी कई बार झूठी बहाने देकर खुद को रोक लिया हूं ।

इन्द्रेश जी, सुबह का बोध कार्य टलता रहा, बुकस्टॉल जाना टलता रहा, और दोनों बार बहाना भीतर से इतना सच्चा लगा कि जांचने का खयाल ही नहीं आया। गौर करने की बात ये है कि बहाना हर बार नया होता है, मगर जो उसे गढ़ता है वो वही पुराना किरदार है। सुबह अलग बहाना, स्टॉल पर अलग बहाना, मगर दोनों की जड़ एक ही जगह बैठी है। तो अगली बार जब भीतर से कोई वजह उठे रुकने की, सवाल ये मत पूछिए कि वजह क्या है, पूछिए कि इसे गढ़ने वाला कौन है।