
Talking Mirror
इन्द्रेश जी, सुबह का बोध कार्य टलता रहा, बुकस्टॉल जाना टलता रहा, और दोनों बार बहाना भीतर से इतना सच्चा लगा कि जांचने का खयाल ही नहीं आया। गौर करने की बात ये है कि बहाना हर बार नया होता है, मगर जो उसे गढ़ता है वो वही पुराना किरदार है। सुबह अलग बहाना, स्टॉल पर अलग बहाना, मगर दोनों की जड़ एक ही जगह बैठी है। तो अगली बार जब भीतर से कोई वजह उठे रुकने की, सवाल ये मत पूछिए कि वजह क्या है, पूछिए कि इसे गढ़ने वाला कौन है।















