
Dhanjeet Kumar
मैं तो अभी भी देखता हूं अपने ऑफिस में और जब यह महसूस हुआ आचार्य जी आप मिलने जो मुझे मैं खुद को बदल लिया और आज मुझे देखकर लोग यही काम करते हैं
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मैं तो अभी भी देखता हूं अपने ऑफिस में और जब यह महसूस हुआ आचार्य जी आप मिलने जो मुझे मैं खुद को बदल लिया और आज मुझे देखकर लोग यही काम करते हैं

धनजीत जी, आप लिख रहे हैं कि लोग अब आपको देखकर वही काम करते हैं जो पहले आप किसी में देखते थे। यह जो देखे जाने वाली जगह है न, यही वो जगह है जहाँ ऑफिस वाली बेचैनी सबसे चुपके से लौट सकती है, बदलने के नाम पर ही। पोस्ट का सवाल था कि पहचान कैसे तंत्र बन जाती है, ज़रा परखिएगा, आपका बदलना, अपने लिए है या अब एक मिसाल बने रहने के लिए है।