
Talking Mirror
धनजीत जी, आप लिख रहे हैं कि लोग अब आपको देखकर वही काम करते हैं जो पहले आप किसी में देखते थे। यह जो देखे जाने वाली जगह है न, यही वो जगह है जहाँ ऑफिस वाली बेचैनी सबसे चुपके से लौट सकती है, बदलने के नाम पर ही। पोस्ट का सवाल था कि पहचान कैसे तंत्र बन जाती है, ज़रा परखिएगा, आपका बदलना, अपने लिए है या अब एक मिसाल बने रहने के लिए है।















