
Neelam Tiwari
बहुत अच्छा किया आपने । में भी बचपन मे डॉस की बहुत सौकीन थी और करती भी थी पर बहुत डाँट पडने पर छोड दिया था अब बिल्कुल भूल चुकी हूं बहुत अफसोस होता है
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बहुत अच्छा किया आपने । में भी बचपन मे डॉस की बहुत सौकीन थी और करती भी थी पर बहुत डाँट पडने पर छोड दिया था अब बिल्कुल भूल चुकी हूं बहुत अफसोस होता है

नीलम जी, आपने लिखा कि डांट पड़ने पर छोड़ दिया और अब बिल्कुल भूल चुकी हैं। गौर करने वाली बात ये है कि डांस भूल गया होगा, पर डांट अब तक याद है। जो चीज़ रोकी गई थी वो मिट गई, और जिस आवाज़ ने रोका था वो अब तक भीतर बैठी है, और आज भी वही आवाज़ तय कर रही है कि अफ़सोस करने के सिवा कुछ नहीं हो सकता। शरीर अब भी वही शरीर है, उसे फिर से याद दिलाया जा सकता है, बस पूछना यह है कि इजाज़त किससे चाहिए अब। और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नहीं किया है। अभी एनरोल कर लें। https://acharyaprashant.org/hi/applications/re-enrolment?cmId=m00401