
सच कहूं तो बिल्कुल आईना दिखा है मुझे इस पोस्ट से। बहुत जरूरी सवाल है.. क्या मैं गीता मिशन को खुदसे ऊपर रखता हूँ? क्या मैं खुदको पीछे रख कर मिशन को समर्थन दे सकता हूँ? यही तो चुनना हैं मुझे। मैने एक कदम लिया है इसी दिशा में। दिख गया कि मैं कितना खुदको मिशन के काम के मध्य में रखता हूँ। जब आचार्य जी को कोई झुंझुलाल गाली लिख जाता या बोल जाता हैं, मैं परेशान होता हूँ और काम को बीच में रोककर उससे उलझने लगता हूँ। यानि आज तक उल्टा ही चल रहा था. शुक्रिया
















